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उन्होंने एक भरपूर ज़िंदगी जी। उन्हें धूम-धाम से विदा कीजिए

 उदय सिंह यादव, प्रधान संपादक - INA NEWS

"दिलीप कुमार की उम्र 98 साल थी, उन्होंने एक भरपूर ज़िंदगी जी। उन्हें धूम-धाम से विदा कीजिए। अफ़सोस की कोई वजह नहीं है।
अफ़सोस करना है तो उन चीज़ों का कीजिए जिन्होंने दिलीप कुमार को दिलीप कुमार बनाया लेकिन दिलीप कुमार के सक्रिय रहते ही उन्हें रुपहले पर्दे से विदा कर दिया गया, जबकि वे एक सुंदर समाज रचने की प्रेरणा थीं।
दिलीप कुमार को पर्दे पर देखते ही सादगी और सच्चाई नज़र आती थी जिसके सामने तमाम चमक-दमक फ़ीक़ी पड़ जाती थी। वे ऐसे नायक थे जिनके ज़रिये मेहनत की लूट से लड़ने का हौसला मिलता था। जो करोड़ों की दौलत और सल्तनत को किसी की मुहब्बत में क़ुर्बान कर देता था। जो फ़र्ज़ के लिए अपने बेटे और भाई को गोली मार सकता था और आसमान पर क्रांति का परचम लहरा सकता था। वो एक संपादक था जो अपने दफ़्तर में किसी पैसे और ताक़त के ग़ुरूर से फूले गाल पर तमाचा मार सकता था। जिसने युसुफ़ और दिलीप को दो जिस्म एक जान की तरह जिया।
कभी सोचिए, आज की फ़िल्मों में ये सब कहाँ है? कहाँ है मज़दूर, कहाँ है किसान (जबकि सात महीने से ज़्यादा वक़्त से किसान दिल्ली घेर कर बैठे हैं।) कहाँ है क्रांति, कहाँ है वो गीत- 'हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे..!"
अफ़सोस करना हो तो इस बात का करिये कि आज देश के हर कोने को भ्रष्टाचार से रँगने वाला कोई कॉरपोरेट टाइकून अपने पैसे से फ़िल्म बनाता है ताकि उसके बाप को चोर-लुटेरा नहीं, 'गुरु' माना जाये।
दिलीप कुमार रुपहले पर्दे पर जादू रचते थे, पर उन्हें भी किसी राजनीति ने रचा था। एक समाज ने रचा था जिसके अंदर समता, स्वतंत्रता और भाईचारे की ललक थी। जो रुपहली कहानियों की ही तरह का भविष्य चाहता था।
दिलीप कुमार से मुहब्बत है तो इस सपने को ज़िंदा रखिये। दिलीप हमेशा आसपास खिलखिलाते नज़र आयेंगे।
बहरहालस रस्म है तो कहता हूँ- अलविदा युसुफ़ साहब उर्फ़ दिलीप कुमार! याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि भूलने की कोई वजह नहीं है!!"

INA NEWS DESK

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