हरदोई में लखनऊ स्नातक एमएलसी चुनाव की सरगर्मी के बीच भाजपा प्रत्याशी अवनीश सिंह को लेकर उठे सवालों ने जिले की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। मल्लावां नगर इकाई के महामंत्री और नामित सभासद वीरेंद्र मिश्रा ‘बाबा’ के तीखे बयान ने संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मुद्दा चर्चा में ला दिया है।अवनीश सिंह हरदोई जनपद के कासिमपुर थाना क्षेत्र के तेरवा दहिगवां गांव के रहने वाले हैं।ऐसे में अपने ही जिले में संपर्क अभियान और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद को लेकर उठे सवाल राजनीतिक रूप से अहम हैं।
सवाल सीधा है—जब अपने ही संगठन का पदाधिकारी प्रत्याशी तक पहुंच और संवाद पर नाराजगी जता रहा है,तो स्नातक मतदाताओं के बीच अभियान की वास्तविक स्थिति क्या है?
वीरेंद्र मिश्रा ‘बाबा’ ने अपने बयान में कथित ‘मठाधीशों’ पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग अपनी ऊपर और नीचे की जेबों में दो-दो हजार, पांच-पांच हजार वोटों के दावे लेकर घूमते हैं, जबकि जमीनी कार्यकर्ताओं की सुध नहीं ली जाती। इस बयान ने चुनावी रणनीति पर तीखा सवाल खड़ा किया है—क्या हजारों वोटों की गारंटी देने वाले लोगों के भरोसे चुनाव जीता जा सकता है, या घर-घर जाकर मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की भूमिका ज्यादा अहम है? ‘बाबा’ का कहना है कि कार्यकर्ता धूप में पसीना बहाता है, झंडा उठाता है, पर्चियां बांटता है और कार्यक्रमों में दरी बिछाता है, लेकिन चुनाव आते ही उसकी अहमियत घट जाती है। उन्होंने गधा, घोड़ा और कुत्ता जैसे शब्दों के जरिए भी अपनी नाराजगी व्यक्त की।यह बयान कार्यकर्ताओं के सम्मान और संगठन में उनकी वास्तविक भागीदारी पर सवाल खड़े करता है।
जिले में 47,838 स्नातक मतदाताओं के बीच बेरोजगारी, पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की समस्याएं भी चुनावी बहस का हिस्सा हैं। आलोचकों का सवाल है कि छह साल के कार्यकाल में युवाओं के लिए क्या ठोस पहल हुई? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को आधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी और वाचनालय जैसी सुविधाएं क्यों नहीं मिलीं? यदि ऐसी सुविधाओं के लिए प्रयास किए गए, तो उनका विवरण सार्वजनिक क्यों न हो? युवाओं का कहना है कि चुनाव के समय दरवाजे-दरवाजे पहुंचने से पहले पूरे कार्यकाल के कामकाज की समीक्षा भी होनी चाहिए।
एमएलसी विकास निधि का हिसाब आखिर कहां है? युवाओं ने सवाल उठाया है कि विकास निधि से कितनी राशि उपलब्ध हुई, किन परियोजनाओं को मंजूरी मिली, कितना धन खर्च हुआ और छात्रों, युवाओं को कितना लाभ पहुंचा?
इन सवालों का जवाब आरोपों या नारों से नहीं,बल्कि आधिकारिक आंकड़ों और परियोजनाओं के विवरण से मिलना चाहिए। निधि के खर्च पर सवाल उठना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन सार्वजनिक धन का हिसाब मांगना मतदाताओं का अधिकार है। यदि युवाओं के हित में ठोस काम हुए हैं, तो उनकी सूची और उपलब्धियां सामने आनी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल—सिंबल का दम या छह साल के काम का दम? क्या हजारों वोटों के दावे करने वाले कथित मठाधीश मतदाताओं की नाराजगी दूर कर सकते हैं? क्या जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी के बावजूद चुनावी समीकरण मजबूत रहेंगे? और क्या युवाओं को रोजगार, शिक्षा तथा विकास कार्यों पर संतोषजनक जवाब मिलेगा?
वीरेंद्र मिश्रा ‘बाबा’ के बयान ने इन सवालों को हवा दी है, लेकिन एक पदाधिकारी की नाराजगी को पूरे संगठन या सभी मतदाताओं की राय नहीं माना जा सकता। अब प्रत्याशी की उपलब्धियों, विकास निधि के आधिकारिक विवरण और उनके पक्ष के सामने आने से तस्वीर स्पष्ट होगी। इस चुनाव में असली कसौटी यही होगी—वोटों के दावे कितने भी बड़े हों, मतदाता आखिर काम का हिसाब मांगेंगे या नहीं?
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